33 आदिवासी साहित्य की प्रवृत्तियाँ
रमेश चन्द मीणा
- पाठ का उद्देश्य
इस पाठ के अध्ययन के उपरान्त आप –
- हिन्दी साहित्य की मूल से इतर प्रवृत्तियों के बारे में जानकारी मिल सकेगी।
- आदिवासी और दलित समाज की समस्याएँ एवं उनके संघर्ष के भिन्न रूपों को समझ सकेगे।
- आदिवासी समाज, संस्कृति और साहित्य की प्रवृत्तियों की जानकारी प्राप्त की जा सकेंगी।
- आदिवासी साहित्य की आधारभूत साहित्यिक प्रवृत्तियों को समझने व मुख्यधारा के साहित्य से अन्तर को समझा जा सकेगा।
2. प्रस्तावना
हर समाज, संस्कृति और उसका साहित्य, पाठक की समझ का विकास करता है। इनसे उस समाज की विशिष्टताओं का पता चल सकता है। साथ ही विशेष समुदाय की धड़कन, उसके बदलते रुख और दिशा का पता चल सकता है। आज मुख्यधारा से इतर, हाशिए के समाज भी साहित्य में चित्रित होकर साकार हो रहे हैं। जिससे उस समाज की भिन्नता, रीति-रिवाज, परम्परा और आस्थाओं का गहन बोध होता है। साहित्य की प्रवृत्तियों से समुदाय विशेष के विरोध, प्रतिरोध और आन्दोलन का आभास होता है, उसके समाधान के बारे में भी सोचा जाता है। साहित्य हर अछूते व पिछड़े समाज के महत्त्व को उजागर करता है। आदिवासी साहित्य सदियों की दबी आवाज को स्वर दे रहा है। मानवीय मूल्यों को मानने में किसी भी देश के आदिवासी एक ही धरातल पर खड़े नजर आते हैं।
3. आदिवासी साहित्य की प्रवृत्तियाँ
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का इतिहास पुस्तक में जन समूह की बदलती हुई प्रवृत्तियों के आधार पर हिन्दी साहित्य का काल विभाजन किया है। रचना की प्रचुरता और स्वरूप के आधार पर काल का नामकरण किया है। इस सन्दर्भ में उनका महत्त्व सभी ने स्वीकार किया है। उनका यह वाक्य हिन्दी साहित्य के इतिहास का दर्शन-वाक्य बन चुका है – ‘जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ इनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितियों के अनुसार होती है।’ रामचन्द्र शुक्ल के दिए सिद्धान्त से बहुतों को एतराज रहा है, पर कोई भी उनसे इतर या आगे की बात नहीं कह सका। या तो विरोध किया या सहमत हुए। लेकिन साहित्यिक विमर्श ने सारी पूर्व अवधारणाओं को बदल डाला। दलित विमर्श से उपजे साहित्य ने पूर्व साहित्य को ब्राह्मणवादी घोषित कर दिया। अब दलित, स्त्री और आदिवासी साहित्य बड़ी संख्या में लिखा जाने लगा है। इन दोनों ही प्रवृत्तियों का (दलित और स्त्री) पूर्व साहित्य प्रेमियों द्वारा जितना विरोध हो सकता था किया गया, लेकिन दो-तीन दशक के बाद अब स्वीकार का भाव दिखाई देने लगा है। आदिवासी साहित्य के साथ भी यही इतिहास दोहराया जा रहा है। सर्वप्रथम तो इसे दलित साहित्य के दायरे में ही रखकर देखा जाता रहा। जब आदिवासी चिन्तकों द्वारा इस बात का गहराई से विश्लेषण हुआ तो पाया गया कि दलित साहित्य व आत्मकथाएँ अक्सर हिन्दू वर्ण व्यवस्था के हाशिए पर मर-मरकर जी रही दलित जातियों की आत्म अभिव्यक्तियाँ रही हैं। लेकिन आदिवासी समाज की सामाजिक समानता की लड़ाई वैसी नहीं रही जैसी दलित जातियों की रही। आदिवासी हमेशा ही मुख्यधारा से दूर, बहुत दूर रहा है। उनकी आधारभूत जरूरतें, समस्याएँ और संघर्ष भी भिन्न रहे हैं। इसलिए आदिवासी साहित्य पूर्व में लिखे गए समग्र साहित्य से अलग, अनूठा और भिन्न विशेषताओं से परिपूर्ण रहा है।
आदिवासी साहित्य की प्रवृत्ति में प्रकृति, जंगल, पहाड़, नदी और पेड़ प्रमुख रूप से आते हैं। विस्थापन और अस्मिता का सवाल उनकी मुख्य समस्याएँ और आसन्न संकट हैं। मुख्यधारा से मुठभेड़ और संघर्ष की चेतना का भाव प्रबल रूप से इन रचनाओं में देखा जा सकता है। अपने समुदाय की पहचान की समस्या रचनाकारों में हमेशा से रही है। इसे भारतीय साहित्य की मूल प्रवृत्ति से जोड़कर भी देख सकते हैं। भारत भारती की पंक्ति हैं – ‘हम क्या थे और क्या हो गए हैं और क्या होंगे।’ मैथिलीशरण गुप्त जैसी चिन्ता आदिवासी साहित्य में भी देखी जा सकती है। दलित का अतीत अत्यन्त पीड़ा, यातना और प्रताड़ना का रहा है, जबकि आदिवासी का वर्तमान कंटकाकीर्ण और भविष्य अन्धेरे में है। देश के होने वाले विकास ने आदिवासी जमीन को हर कदम पर छीना है। विकास ने आदिवासी क्षेत्रों में लूट के असंख्य केन्द्रों की स्थापना की है। हिंसा और बाजार जो उनका स्वभाव नहीं रहा है, उन पर बरबस थोपा गया है। नक्सलवाद के नाम पर आए दिन उन्हें हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है। संवैधानिक तौर पर संरक्षित होते हुए भी उन्हें नहीं लगता कि वे नितान्त सुरक्षित हैं। ऐसे अन्तर्विरोध जग जाहिर हैं और आदिवासी साहित्य में पूरी तरह से न सही फिर भी बहुत हद तक दिखाई देने लगे हैं। कवि, कथाकार और आदिवासी चिन्तक आदिवासी के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। कोई चार-पाँच दशक से सामने आ रहे आदिवासी साहित्य की कुछ प्रवृत्तियाँ उभरकर आने लगी हैं।
4. प्रकृति से आदिवासी सम्बन्ध
सदियों से आदिवासी प्रकृति के नजदीक रहा है। इस समुदाय का जितना गहरा रिश्ता प्रकृति से रहा है, वैसा अन्य किसी समाज का नहीं मिलता। आदिवासी प्रकृति के साथ रहना चाहता है। इसलिए जब भी उनसे उनकी जमीन लेने की बात की जाती है, उन्हें बेहद नागवार गुजरता है। चाहे कहीं का भी साहित्य हो, यह प्रवृत्ति समान रूप से दृष्टिगोचार होती है। कोई उनसे उनकी जमीन छीनता है तो वे अपने को अस्तित्वहीन पाते हैं। प्रकृति के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है। सिएन्थल की प्रसिद्ध कविता प्रमुख के नाम पत्र में आदिवासी का जमीन से लगाव मरने-जीने की हद तक है। इस जुड़ाव को गैर-आदिवासी समाज के लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं। प्रभात की प्रकृति की गन्ध में आदिवासी समाज प्रकृति में ही अपनी पहचान एवं अस्तित्व देखता है, प्रकृति के बिना वे अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता है।
प्रकृति हमें बहुत कुछ देती है और देती रहेंगी। हर समाज प्रकृति का ऋणी है। आदिवासी इस अर्थ में कथित सभ्य, सुसंस्कृत समाज को दिशा देता नजर आता है। आदिवासी हर तरह से उसका संरक्षक है। पेड़ों का कटना, जंगल का घटना और नदियों का सूखना आम बात हो चली है। जब से आदिवासी का हक जंगल से कम हुआ है, जंगल दिनोंदिन घटता चला जा रहा है। पेड़ से प्रेम पर कितने ही गीत, रीति-रिवाज और परम्परा साहित्य में देखी जा सकती है। जितनी भी कविता, कहानियाँ और उपन्यास अब तक लिखे जा चुके हैं, प्रकृति को बचाने की चिन्ता से सराबोर है। विनोद कुमार शुक्ल की कविता जंगल किसका है और निर्मला पुतुल की कविता पहाड़ी पुरुष, पहाड़ी स्त्री, पहाड़ी बच्चा आदि में प्रकृति से उनके जुड़ाव की चिन्ता सामने आती है। वाहरू सोनवणे की पहाड़ हिलने लगा है, इस दिशा में महत्त्वपूर्ण है। पहाड़ के घटने पर हरिशंकर अग्रवाल पहाड़ कविता में लिखते हैं – ‘धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं पहाड़/ ट्रकों में लादकर ले जाता है ठेकेदार।’ विनोद कुमार शुक्ल की कविता जवाब देती है कि जंगल आदिवासी के अलावा किसी का भी नहीं हो सकता है – ‘जो प्रकृति के सबसे अधिक निकट है/ जंगल उनका है/ आदिवासी जंगल में सबसे अधिक निकट है/ इसलिए जंगल उन्हीं का है।’ रचनाकारों में सर्वानुमति बनी हुई है कि जंगल पर सबसे पहला हक आदिवासी का ही है। निर्मला पुतुल की बिटिया मुर्म के लिए, में पेड़ की चिन्ता है। अनुज लुगुन की कविता हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती में सपनों में नदी आती है। सरिता सिंह बड़ाइक की कविता आज का जंगल में वैसा जंगल न रहने की चिन्ता घनीभूत है –
‘घनी छाँव तले सुस्ताते थे पथिक/ नहीं है अब वैसा जंगल।’ इस तरह आदिवासी साहित्य में प्रकृति, जंगल, पहाड़, नदी और पेड़ कई रूपों में आते हैं।
5. विस्थापन
जंगल है तो आदिवासी हैं, नदी है तो आदिवासी हैं। वह अपनी जमीन छोड़कर जी नहीं सकता है। उसका अस्तित्व ही जंगल से है और आज वही उनसे छिना जा रहा है। वह असहनीय कष्ट सहकर भी जी सकता है, अगर जंगल, पहाड़ और जमीन उसके पास रहे, अन्यथा उनका अस्तित्व ख़तरे में है। कहानी और उपन्यासों में विस्थापन के बाद आदिवासियों द्वारा भोगी जा रही गहन पीड़ा, कष्ट और यातना उजागर होती है। उजड़ते, उखड़ते आदिवासी के कई चित्र कविताओं में चित्रित हुए हैं। मंजू ज्योत्स्ना की कविता विस्थापित का दर्द में बेटे का इन्तजार करते बाप की पथराई निगाहों के दर्द को उजागर किया है – ‘मेरा बेटा अवश्य आएगा/ अवश्य/ क्योंकि अगले वर्ष पलाश खिलेंगे/ मेरे आंगन में।’ जितने भी आदिवासी जीवन पर उपन्यास रचे गए हैं उनमें विस्थापित होते, विस्थापन भोगते आदिवासी के कई रूप-रंग चित्रित हुए हैं। विनोद कुमार का समर शेष है और झारखण्ड मिशन, पुन्नी सिंह का सहराना, मनमोहन पाठक का गगन घटा घहरानी रणेन्द्र का ग्लोबल गांव के देवता में अपनी जमीन से उखड़ते आदिवासियों की त्रासदी देखी जा सकती है। विस्थापन का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता कि जिस राँची में अस्सी फीसद आदिवासी थे, वहाँ आज पन्द्रह फीसद बचे हैं। देश के अधिकांश कस्बों और शहरों का यही हाल है। आदिवासी लगातार अपनी जमीन से उखड़ते जा रहे हैं। लगातार पीछे और पीछे धकेले जा रहे हैं।
6. आदिवासी स्त्री का साहस, उदारता और श्रम
आदिवासी महिला मुख्यधारा की महिला से कई अर्थों में भिन्न रही है। निर्मला पुतुल की कविता में अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री और स्त्री की आर्थिक विडम्बना देख सकते हैं। निर्मला पुतुल की कविता उतनी दूर मत ब्याहना बाबा! में आदिवासी स्त्री का घर से बेजोड़ लगाव दर्शाया गया है। उनकी कविता में आदिवासी स्त्री का सांस्कृतिक रूप और उत्सवी चेहरा भी देखने को मिलता है। उनकी कविता में आदिवासी महिला के कई रंग-रूप दिखाई देते हैं, विशेषकर शादी करके जाने वाली लड़की के पिता के प्रति दायित्व बोध के गहरे अर्थ झाँकते हैं। आदिवासी समाज पर जब भी संकट आया है, आदिवासी स्त्री हर संकट में भागीदार रही है। ग्रेस कुजूर की एक और जनी शिकार में तीर लेकर खड़ी हो जाती है – ‘ए संगी/ तानो अपना तरकस/ नहीं हुआ है भोंथरा अब तक/ बिरसा आबा का तीर।’ लेकिन गैर-आदिवासी शोषक वर्ग आदिवासी स्त्री को भोली एवं कमजोर समझकर शोषण करने से बाज नहीं आते हैं, इस सन्दर्भ में निर्मला पुतुल की क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए कविता के बोल से ही लग जाता है कि वह उतनी भोली नहीं रही है, वह इस शोषणकारी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है।
7. समस्या व आसन्न संकट में घिरे आदिवासी
आज उनकी सबसे बड़ी समस्या विस्थापन की रही है, जो हर रचना में उभरकर आती है; लेकिन इसके अलावा कुछ उनकी आदतें रही हैं – नशा, शराब की लत, ऋणग्रस्तता और अन्धविश्वास… ऐसी समस्याएँ हैं जिनसे उन्हें स्वयं लड़ना है। मनमोहन पाठक का उपन्यास गगन घटा घहरानी हो या राकेश कुमार सिंह का पठार पर कोहरा या पुन्नी सिंह का सहराना या कोई भी कहानी… सभी में ये समस्याएँ उभरकर सामने आई हैं। गगन घटा घहरानी एवं सहराना का नायक शराब से बचा हुआ नहीं है। उनका समाज शराब से बदहाल है, शराब उन्हें गरीबी में जीने पर मजबूर करती है। निर्मला पुतुल अपनी कविता में इन समस्याओं पर चिन्ता व्यक्त करती हैं, साथ ही आदिवासी समाज को जाग्रत करती हैं – ‘आओ मिलकर बचाएँ अपनी बस्तियों को/ नंगी होने से/ शहर की आबोहवा से बचाएँ उसे/ बचाएँ डूबने से/ पूरी बस्ती को/ हड़िया में।’ अन्धविश्वास की सबसे अधिक शिकार महिलाएँ होती हैं। कुछ मत कहो सजोनी किस्कू! कविता में महिला के हल चलाने पर माँझी थाने का सिंहासन डोल उठता है।
8. प्रतिरोध और संघर्ष की चेतना
आदिवासी अस्मिता एवं अस्तित्व सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है। यह विषय हर रचनाकार की चिन्ता में है। जंगल, आसमान और घर वह हर चीज बचानी है, जिसके बिना जीना मुश्किल है। कवि सवाल करते हैं – ‘क्यों धरती का रंग हमारे बदन–सा है/ क्यों आकाश हमारी आँखों से छोटा है/… तुम कभी हारना मत/हम लड़ते हुए मारे जाएँगे।’ लड़ते हुए मारे जाने की फितरत जिनमें है, वे इस असंवेदनशील व्यवस्था में लगातार मारे जा रहे हैं, लगातार घट रहे हैं, लगातार अस्मिता को बचा पाने की लड़ाई में प्राणों की आहूतियाँ दे रहे हैं। वक्त की विडम्बना है कि आजाद भारत में सदियों से जंगल में रहने वालों से उनके जंगल, पहाड़ छीने जा रहे हैं। उनकी आज कोई सुनने वाले नहीं हैं, लेकिन साहित्य की आवाज दबाई नहीं जा सकती।
मुख्यधारा से मुठभेड़ और संघर्ष की चेतना का भाव प्रबल रूप से सामने आ रहा है। इन कविताओं में देखी जा सकती है। निर्मला पुतुल, रामदयाल मुण्डा, अनुज लुगुन, वाहरू सोनवणे, अशोक सिंह एवं अन्य रचनाकारों की रचनाओं में प्रतिरोध, आक्रोश और संघर्ष की चेतना प्रबल रूप में देखी जा सकती है। निर्मला पुतुल की कविता में आक्रोश के कई रूप दिखाई देते हैं। उनकी मैं वो नहीं जो तुम समझते हो, मैं चाहती हूँ कविताओं में आक्रोश है। अशोक सिंह की कविता मुन्नी हाँसदा के लिए पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी उफनती नदी के सामने खड़े हों – ‘लड़ो, मुन्नी हाँसदा! लड़ो!/लड़ो, कि अपने हक-अधिकारों के लिए/ लड़ो, यह मानकर लड़ो कि/ यहाँ बिना लड़े कुछ भी नहीं मिलता।’ लोकतन्त्र में बिना आवाज उठाए और बिना लड़े कुछ नहीं मिलता। आदिवासी महिला भी अपने हकों के लिए लड़ती है, क्योंकि बिना लड़े इन्साफ नहीं मिलता। वाहरू सोनवण की स्टेज कविता में प्रतिरोध का दार्शनिक स्वर है। बोले गए शब्द, तर्क और सवाल हमें एक दिन जवाब जरूर दिलाते हैं। इसलिए पूछो और पूरी ताकत लगाकर पूछो कि ‘हमारे हिस्से की रोशनी कहाँ है?’ यह सवाल उठना चाहिए कि हम कब से अन्धेरे में हैं? अन्धेरे में पैदा हुए और अन्धेरे में ही जीते रहे। हमारे बाप-दादा और एक दिन मर खप गए अन्धेरे में ही। अब हम अन्धेरे में रखने की सोची-समझी साजिश के खिलाफ खड़े हो जाए। आदिवासियों का इतिहास संघर्ष एवं विद्रोह का रहा है।
झारखण्ड में हुए पहाड़िया विद्रोह, कोल, सन्थाल विद्रोह और बिरसा मुण्डा के आन्दोलन का सामाजिक सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्त्व रहा है। बिरसा के आन्दोलन से झारखण्ड ही नहीं पूरा देश प्रभावित हुआ है। बिरसा मुण्डा का आदिवासी रचनाओं में विशेषकर कविताओं पर बड़ा प्रभाव है। महाश्वेता देवी का उपन्यास जंगल का दावेदार के बाद कई कहानियाँ बिरसा को लेकर रची गईं। बिरसा का व्यक्तित्व और आन्दोलन विविध रूपों में साहित्य में अभिव्यक्त हुआ। उनका उलगुलान शब्द कवियों की चेतना में रहा है। भुजंग मेश्राम की कविता ओ मेरे बिरसा में ‘उलगुलान! उलगुलान! उलगुलान! जो बन गया है हमारी संस्कृति की लड़ाई।’ सुरेन्द्र कुमार नायक की उलीहातू और हरिराम मीणा की बिरसा मुण्डा की याद में, कविताओं में जिस तरह बिरसा आते हैं, उसका अपना सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्त्व है। जब भी आदिवासी सकंट में आता है, वह बिरसा को पुकारता है – ‘बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा।’ समकालीन कविता में जिस तरह से बिरसा बरबस चले आते हैं। यह बिरसा के आन्दोलन की छवियाँ हैं, जो व्यक्ति से लेकर समाज और साहित्य तक में बसी हुई है।
9. गैर आदिवासी नायक और कथा साहित्य
हिन्दी कथा साहित्य के नायक आदिवासी कम, गैर-आदिवासी अधिक रहे हैं। पठार पर कोहरा (रोकश कुमार सिंह), ग्लोबल गाँव के देवता (रणेन्द्र), धूणी तपे तीर (हरिराम मीणा), दंश, मगरी मानगढ़ (राजेन्द्र मोहन भटनागर), जहाँ से जंगल शुरू होता है (संजीव) आदि उपन्यासों में नायक गैर-आदवासी हैं। इसके अलावा आदिवासी साहित्य में ऐसा विभाजन भी नहीं किया गया कि आदिवासी साहित्य कोई गैर-आदिवासी नहीं लिख सकता। जो भी संवेदनशील है, उनकी समस्याओं से रूबरू है, लिख सकता है। यही कारण है कि रचनाओं में गैर-आदिवासी नायक भी उनकी लड़ाई लड़ता हुआ दिखाई देता है। जो संवेदनशील है, वे आदिवासी क्षेत्र में जाकर उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं।
पठार पर कोहरा, गायब होता देश एवं ग्लोबल गाँव के देवता का नायक गैर-आदिवासी है, जो शिक्षक के रूप में आदिवासी क्षेत्र में जाते हैं। पठार पर कोहरा का नायक अपना स्थानान्तरण अन्य जगह करवाने की कोशिश करता है, और नहीं होने पर न केवल वहाँ रहता है, अपितु आदिवासियों में व्याप्त अशिक्षा के अन्धेरे को दूर करने में जुट जाता है। वह आदिवासी समाज के लिए समर्पित हो जाता है। ग्लोबल गाँव के देवता का शिक्षक असुरों की लड़ाई में कन्धा से कन्धा मिलाते हुए साथ होता है। दूसरी तरफ गगन घटा घहरानी और सहराना के ठेठ आदिवासी नायक गैर-आदिवासी से मिलकर अपनी लड़ाई लड़ते हैं। इन रचनाओं के रचनाकार गैर आदिवासी रहे हैं। बेशक इन रचनाकारों की संवेदनशीलता पर किसी तरह के शक की गुंजाइश नहीं है। आक्रोश बाबाराव मड़ावी की (मराठी में ‘टाहो’) हिन्दी में अनूदित ऐसी रचना है जो उसी समुदाय के रचनाकार द्वारा रचित उपन्यास है, लेकिन उसका नायक भी तभी शिक्षा हासिल कर पाता है जब उसे गैर-आदिवासी का आश्रय मिलता है।
10. निष्कर्ष
आदिवासी सदियों से प्रकृति के नजदीक रहा है। जंगल, पहाड़ और नदियों की आज जो स्थिति है, इसके लिए गैर-आदिवासी और व्यवस्था ही जिम्मेदार है। आज प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। अस्मिता के संकट से घिरा आदिवासी कई अर्थों में सभ्य, सुसंस्कृत समाज को दिशा देता नजर आता है। वह प्रकृति का रखवाला साबित होता है, तो बाकी सब नष्ट करने में तुले हैं। जब से आदिवासी को जंगल से दूर किया जाने लगा है तब से जंगल दिनोंदिन घटता चला जा रहा है। ऐसे समुदाय, जो प्रकृति के रक्षक हैं, वे अस्मिता के संकट से गुजर रहे हैं। वे चारों तरफ संकट से घिरे नजर आ रहे हैं। दलित साहित्य के सवालों और प्रवृत्तियों से अलग नई जमीन तोड़ता साहित्य सामने आया है जो प्रकृति के साथ खुद को जोड़कर इतर सभ्यताओं को दिशा देता है। आदिवासी जीवन पर लिखी रचनाओं की कुछ खास प्रवृत्तियाँ रही हैं
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अतिरिक्त जानें –
पुस्तकें
- आदिवासी साहित्य यात्रा, रमणिका गुप्ता, राधाकृष्ण प्रकाशन, नईदिल्ली
- आदिवासी साहित्य विमर्श, गंगासहाय मीणा, अनामिका प्रकाशन,
- आदिवासी विमर्श, डॉ. रमेश चन्द मीणा (संपा.), राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर
- आदिवासी अस्मिता:प्रभुत्व और प्रतिरोध, अनुज लुगुन(संपा.), अन्यय प्रकाशन, दिल्ली
- आदिवासी स्वर :वाचिक परम्परा व साहित्य, वी.सी चटर्जी एवं जयशंकर उपाध्याय, आकृति प्रकाशन दिल्ली
- क्रान्तिकारी आदिवासी: आजादी के लिए आदिवासियों का संघर्ष, केदार प्रसाद मीणा (संपा.), साहित्य उपक्रम, दिल्ली
- बिरसा मुण्डा और उनका आन्दोलन, कुमार सुरेश सिंह, वाणी प्रकाशन, दिल्ली
- Jharkhand Missing Jharkhand : An Adivasi Homeland, Ajitha S George, Aakar Book, New Delhi
- Tribal development : The concept and the frame, B.D. Sharma, Sahyog Pustak Kuttir (Trust), New delhi
वेब लिंक्स-
- https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80_%28%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%29
- https://www.youtube.com/watch?v=rjbrJlVjk-E
- https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF
- http://archive.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=38367:2013-02-07-05-28-28